Wednesday 7 October 2009

साहित्य समाचार




कुंवर नारायण को ज्ञानपीठ पुरस्कार

तीसरा सप्तक के यशस्वी कवि कुंवर नारायण को मंगलवार को भारतीय भाषाओं के साहित्य में उल्लेखनीय योगदान के लिए 41वें ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने संसद भवन के बालयोगी सभागार में एक गरिमामय समारोह में कुंवर नारायण को वर्ष 2005 के ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया। सम्मान में 7 लाख रुपये की राशि, वनदेवी की प्रतिमा, प्रशस्तिपत्र, प्रतीक चिन्ह, शाल और श्रीफल शामिल है। भारतीय ज्ञानपीठ के निदेशक रवींद्र कालिया के अनुसार इस बार से पुरस्कार राशि पांच लाख रुपये से बढ़ाकर 7 लाख कर दी गई है।

19 सितम्बर 1927 को जन्मे कुंवर नारायण को पद्म भूषण, साहित्य अकादमी पुरस्कार, हिन्दी अकादमी का श्लाका सम्मान, कबीर सम्मान तथा मानद डीलिट की उपाधि भी मिल चुकी हैं।

उडिया के प्रसिद्ध कवि एवं ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता डॉ सीताकांत महापात्र की अध्यक्षता वाली चयन समिति ने कुंवर नारायण को यह पुरस्कार देने का निर्णय दिया। इससे पहले 1999 में हिन्दी के लेखक निर्मल वर्मा को यह पुरस्कार मिला था। अब तक सुमित्रा नंदन पंत, दिनकर, अज्ञेय, महादेवी वर्मा और नरेश मेहता जैसे हिन्दी लेखकों को यह पुरस्कार दिया जा चुका है।

कुंवर नारायण का पहला कविता संग्रह चक्रव्यूह 1956 में छपा था। उनके छह कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। आत्मजयी और वाजश्रवा के बहाने उनके चर्चित खण्डकाव्य हैं। उनकी आलोचना की तीन पुस्तकें भी प्रकाशित हैं और उन्होंने विदेशी साहित्य का भी काफी अनुवाद किया है।

कुंवर जी को शब्दसृजन की बधाई एवं शुभकामनाएं।

Sunday 2 August 2009

इस सदी का यह दौर

इस सदी का यह
अजीब-सा दौर है दोस्तो
कि सुबह-सुबह जब
कोई चिड़िया भी गाती है
तो पता नहीं क्यों
लगता है जैसे किसी ने
मेरे घर का कॉल बेल बजाया है...

मुंह-अंधेरे
बारिश की आवाज़ से
चौंक जाता हूं
कि फिर किसी ने
बाथरूम का शावर
खुला तो नहीं छोड़ दिया...

बहुत नेह से जब
करता है कोई बात
तो संदेह होता है
खालिस संदेह...

जब कोई पड़ोसी
चीखता-चिल्लाता है
शायद असह्य यंत्रणा या पीड़ा में
तो गुस्सा आता है
कि इतनी ऊंची आवाज़ में
क्यों लोग सुनते हैं अपने घरों में टीवी

और जब किसी की
बेइंतहा वफादारी का मिलता है
कोई सच्चा दृष्टांत
तो सच पूछिए
अपने घर का कुत्ता
बहुत याद आता है...

क्या इस सदी का यह सचमुच
इतना अजीब-सा दौर है दोस्तो
या कि सिर्फ मुझे ही ऐसा लगा है...

(शीघ्र प्रकाश्य संग्रह से)

 
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